कर्त्ता कारक (प्रथमा विभक्ति) संस्कृत में | Karta Karak in Sanskrit

जो क्रिया के करने में स्वतन्त्र होता है तथा कर्ता के जिस रूप से क्रिया को करने वाले का बोध होता है, वह कर्ता कहलाता है और कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे-

रामः पठति। राम पढ़ता है। यहाँ राम कर्ता है और उसमें प्रथमा विभक्ति लगी है।

Karta Karak Prathama Vibhakti in Sanskrit

प्रथमा विभक्ति का सूत्र – ‘प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा’

केवल प्रातिपादिक अर्थ, लिङ्ग, परिमाण एवं वचन (संख्या) का जहाँ बोध कराना हो, वहाँ प्रथमा विभक्ति होती है। प्रत्येक पद के अर्थ को प्रातिपदिकार्थ कहते हैं। किसी के नाम से किसी व्यक्ति, वस्तु या जाति को बोध हो रहा हो वह प्रतिपदिकार्थ है। अब क्रमशः इनके उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

प्रातिपदिकार्थ – उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः और ज्ञानम्, ये सभी प्रातिपादिकमात्र के उदाहरण हैं। जैसे- कृष्णः रावणं हतः। कृष्ण ने रावण को मारा।

लिङ्गमात्र इति – लिङ्गमात्र के उदाहरण अनियत लिङ्ग शब्द हैं, जैसे- तटः तटी तटयः – यहाँ जाति और द्रव्य से अधिक लिङ्गमात्र अर्थ की प्रतीति होती है, इसलिए यहाँ प्रथमा विभक्ति हुई। तट शब्द अनियत लिंग है, इसका कोई नियत लिंग नहीं है, यह कभी पुल्लिंग, कभी स्त्रीलिंग और कभी नपुंसकलिंग होता है।

परिमाणेति – परिमाण मात्र में – द्रोणो ब्रीहिः। यहाँ परिमाण अर्थ में द्रोण शब्द में प्रथमा विभक्ति होगी।

वचनमिति – वचन संख्या को कहते हैं। संख्यावाचक शब्दों से संख्या अर्थ में ही प्रथमा विभक्ति होती है। विभक्ति के द्वारा प्रातिपादिक संख्या का अनुवाद होता है, जैसे- एकम्, द्वौ, बहवः।

सम्बोधने च – सम्बोधन का बोध कराने के लिए भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे- हे राम ! 

उदाहरण –

सः गृहं गच्छति। वह घर जाता है।

रमा फलं खादति। रमा फल खाती है।

हे राम ! अत्र आगच्छ। हे राम ! यहाँ आओ।


कारक / विभक्ति के भेद –

कर्त्ता कारक (प्रथमा विभक्ति)

कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)

करण कारक (तृतीया विभक्ति)

सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)

अपादान कारक (पंचमी विभक्ति)

संबंध (षष्ठी विभक्ति)

अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)


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