Sampradan Karak Chaturthi Vibhakti in Sanskrit
सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) संस्कृत में | Sampradan Karak in Sanskrit
कर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है अथवा जिसे कुछ देता है, तो लेने वाले की सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है। इसका विभक्ति चिह्न ‘के लिए या को’ है।
उदाहरण – अध्यापकः छात्राय पुस्तकं ददाति। अध्यापक छात्र को पुस्तक देता है। इस वाक्य में कर्ता अध्यापक छात्र को पुस्तक देता है, तो छात्र में सम्प्रदान संज्ञा हुई और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) का सूत्र – ‘कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् चतुर्थी सम्प्रदाने।’
दान के कर्म द्वारा कर्ता जिसे उपकृत अर्थात् खुश करता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा (नाम) होती है और सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण – सः विप्राय गां ददाति। वह ब्राह्मण के लिए गाय देता है। इस वाक्य में वह कर्ता है और दान क्रिया के कर्म गौ के द्वारा विप्र (ब्राह्मण) को उपकृत करता है, अतः विप्र में सम्प्रदान संज्ञा हुई और उससे चतुर्थी विभक्ति हुई।
(1) नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च –
नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (आहुति), स्वधा (बलि), अलम् (समर्थ, पर्याप्त), वषट् (आहुति) के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
हरये नमः। हरी (भगवान) को नमस्कार है।
प्रजाभ्यः स्वस्ति। प्रजा का कल्याण हो।
अग्नये स्वाहा। अग्नि के लिए आहुति।
पितृभ्यः स्वधा। पितरों के लिए अन्नादि।
दैत्येभ्यः हरिः अलम्। दैत्यों के लिए हरि पर्याप्त हैं।
इन्द्राय वषट्। इन्द्र के लिए आहुति।
(2) स्पृहेरीप्सितः –
स्पृह (चाहना) धातु के योग में ईप्सित अर्थात् जिस वस्तु को चाहा जाता है, उस वस्तु में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
सा पुष्पेभ्यः स्पृह्यति। वह पुष्प की इच्छा करती है।
(3) क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः –
क्रुध् (क्रोध करना), द्रुह (द्रोह करना), ईर्ष्या (ईर्ष्या करना), असूय् (गुणों में दोष निकालना या जलना) धातुओं एवं इनके समान अर्थ वाली धातुओं के योग में जिसके प्रति क्रोध, द्रोह, ईर्ष्याऔर असूया की जाती है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
गुरुः शिष्याय क्रुध्यति। गुरु शिष्य पर क्रोध करता है।
सेवकः नृपाय द्रुह्यति। सेवक राजा से द्रोह करता है।
दुर्जनः सज्जनाय ईर्ष्यति। दुर्जन सज्जन से ईर्ष्या करता है।
प्रणयः अशोकाय असूयति। प्रणय अशोक की निन्दा करता है।
(4) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः –
रुचि के अर्थ वाली धातुओं के योग में जिसको वस्तु अच्छी लगती है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
भक्ताय रामायणं रोचते। भक्त को रामायण अच्छी लगती है।
बालकाय मोदकं रोचते। बालक को लड्डू अच्छा लगता है।
(5) धारेरुत्तमर्ण: –
धारि धातु के अर्थ में उत्तमर्ण: (कर्ज देने वाला) में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
सोहनः रमेशाय शतं धारयति। सोहन रमेश के सौ रुपये का ऋणी है।
(6) तादर्थ्ये चतुर्थी –
जिसके लिए कोई चीज हो या जिसके लिए कोई क्रिया की गयी हो उसे तादर्थ्ये कहते हैं। इसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
सः मुक्तये हरिं भजति। वह मुक्ति के लिए हरि को भजता है।
(7) तुमर्थाच्च भाववचनात् चतुर्थी –
तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों के अर्थ में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
भोजनाय गृहं गच्छति बालकः। भोजन करने के लिए बालक घर जाता है।
(8) श्लाघहनुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्य्मानः –
श्लाघ् (स्तुति करना), ह्नुङ् (छिपना, दूर करना), स्था (ठहरना), शप् (उलहना देना) आदि धातुओं के प्रयोग में, जिसे कर्ता अपने भाव का बोध कराना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
गोपी स्मरात् कृष्णाय शपते। गोपी स्मरण करते हुए कृष्ण को उलाहना देती है।
(9) क्लृपि सम्पद्यमाने –
क्लृप्, जन्, भू और सम् पूर्वक धातु के पद के योग में यदि सम्पद्यमान अर्थात् किसी रूप में होने या परिणत होने का भाव रहता है तो चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
भक्तिः ज्ञानाय कल्पते। भक्ति ज्ञान के लिए समर्थ होती है।
(10) हितयोगे –
हित के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-
ब्राह्मणाय हितं कार्यं कुरु। ब्राह्मण के लिए हितकारी कार्य करो।
कारक / विभक्ति के भेद –
सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)
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